श्रीमती अब नहीं, आखिरकार सीईओ

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अध्याय 289

खिड़की के बाहर आसमान पहले ही उजाला होने लगा था।

वह हाँफते हुए उठी, और अपना हाथ उठाकर तेज़ी से धड़कती छाती पर दबा लिया। सपने की तस्वीरें अब भी उसके दिमाग़ में साफ़-साफ़ तैर रही थीं।

इतनी असली कि दिल की धड़कनें बहुत देर तक काबू में ही नहीं आईं।

इस बार जब उसकी आँख खुली, तो बचा हुआ डर तो था ही, पर उस...

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